गिरिडीह | शहर
गिरिडीह स्टेशन: गिरिडीह शहर की ऐतिहासिक धड़कन माने जाने वाले पुराने रेलवे स्टेशन की लगातार उपेक्षा अब जनभावनाओं को भड़का रही है। करीब 150 साल पुराना गिरिडीह रेलवे स्टेशन, जो कभी शहर की जीवनरेखा था, आज बदहाली और अनदेखी का प्रतीक बनता जा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई कार्यकर्ता सुनील खंडेलवाल ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए रेलवे बोर्ड और रेलवे मंत्रालय में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत की प्रति पूर्वी रेलवे मुख्यालय, कोलकाता को भी भेजी गई है।
🏛️ इतिहास का साक्षी, आज उपेक्षित
गिरिडीह का पुराना रेलवे स्टेशन सिर्फ एक परिवहन केंद्र नहीं, बल्कि शहर की पहचान रहा है। औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों के दौर में यह स्टेशन शहर की आर्थिक धुरी माना जाता था।
लेकिन वर्षों से यहां ट्रेन संचालन और विकास कार्यों पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप, स्टेशन का महत्व धीरे-धीरे कम होता गया और नया स्टेशन शहर से दूर स्थापित कर दिया गया।
🚖 ₹10 बनाम ₹150: जनता की जेब पर चोट
सबसे बड़ा सवाल सुविधा और खर्च को लेकर उठ रहा है।
गिरिडीह से मधुपुर तक 38 किलोमीटर का रेल किराया मात्र ₹10 है। लेकिन न्यू गिरिडीह स्टेशन तक पहुंचने के लिए लोगों को ₹100 से ₹150 तक ऑटो या टोटो किराया देना पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सीधा-सीधा आम जनता की जेब पर बोझ है।
एक ओर सस्ता रेल किराया, दूसरी ओर स्टेशन तक पहुंचने के लिए महंगा सफर—यह विरोधाभास अब लोगों के गुस्से का कारण बन चुका है।
📑 रेलवे बोर्ड तक पहुंची शिकायत
सुनील खंडेलवाल ने अपनी शिकायत में स्पष्ट मांग की है कि:
- पुराने गिरिडीह स्टेशन का सर्वे कराया जाए
- स्टेशन का जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण किया जाए
- कोलकाता, पटना जैसे बड़े शहरों के लिए ट्रेन सेवा पुनः शुरू की जाए
- बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए
उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो जनता आंदोलन के लिए मजबूर होगी।
🚉 नया स्टेशन, पुरानी समस्या
न्यू गिरिडीह स्टेशन शहर से काफी दूर स्थित है। आम यात्रियों, खासकर बुजुर्गों और महिलाओं को वहां तक पहुंचने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
दैनिक यात्रियों का कहना है कि अगर पुराने स्टेशन को सक्रिय किया जाए, तो शहर के भीतर आवागमन सुगम हो सकता है और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।
📊 आर्थिक और सामाजिक असर
रेलवे स्टेशन सिर्फ सफर का साधन नहीं होता, बल्कि वह आसपास के बाजार, होटल, परिवहन और छोटे व्यवसायों के लिए आय का स्रोत होता है।
पुराने स्टेशन की अनदेखी से स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को नुकसान हुआ है।
कई लोगों का मानना है कि स्टेशन का पुनरुद्धार शहर के विकास को नई गति दे सकता है।
🔍 क्या कहता है प्रशासन?
अब तक रेलवे या प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन शिकायत दर्ज होने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि उच्च स्तर पर इस पर विचार किया जाएगा।
⚠️ आंदोलन की आहट?
खबर है कि स्थानीय नागरिक संगठन और व्यापारी संघ भी इस मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं।
अगर जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
🔎 निष्कर्ष
गिरिडीह का 150 साल पुराना रेलवे स्टेशन सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक विरासत है।
₹10 के रेल टिकट और ₹150 के ऑटो किराए का अंतर अब सवाल बन चुका है।
क्या रेलवे प्रशासन इस आवाज को सुनेगा?
या फिर यह मुद्दा आंदोलन की राह पकड़ेगा?
अब नजर रेलवे बोर्ड और मंत्रालय की कार्रवाई पर है।
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