झारखंड में सरकारी नौकरी पाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए यह खबर चौंकाने वाली है। जिस सरकारी नियुक्ति को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, वही नौकरी सैकड़ों युवाओं के लिए मानसिक, आर्थिक और सामाजिक उत्पीड़न का कारण बन गई है। मामला पथ निर्माण विभाग में वर्ष 2022 में नियुक्त सहायक अभियंताओं (Assistant Engineers) से जुड़ा है, जिन्हें नियुक्ति पत्र मिलने के बावजूद 3 से 6 महीने तक न पोस्टिंग मिली, न वेतन।
📌 क्या है पूरा मामला?
मुख्यमंत्री द्वारा वर्ष 2022 में कुल 609 सहायक अभियंताओं को नियुक्ति पत्र सौंपे गए। इनमें—
- पथ निर्माण विभाग
- जल संसाधन विभाग
- पेयजल एवं स्वच्छता विभाग
शामिल थे। नियुक्ति पत्र मिलने के बाद नियमों के अनुसार उम्मीदवारों को तय समय सीमा में विभाग में योगदान देना था, लेकिन यहीं से शुरू हुई विभागीय लापरवाही।

⏳ अनिवार्य प्रतीक्षा, लेकिन बिना वेतन
नियमों के अनुसार:
- नियुक्ति पत्र मिलने के बाद
- उम्मीदवार को पोस्टिंग देकर कार्य ग्रहण कराना विभाग की जिम्मेदारी होती है
लेकिन पथ निर्माण विभाग ने—
- पोस्टिंग में 3 से 6 महीने तक की देरी की
- इस पूरे समय को “अनिवार्य प्रतीक्षा काल” बताया
- और सबसे गंभीर बात—इस अवधि का वेतन नहीं दिया
जबकि वित्त विभाग की गाइडलाइन साफ कहती है कि यदि किसी कर्मचारी से विभागीय गलती के कारण काम नहीं लिया जाता, तो उसका दोष कर्मचारी का नहीं माना जाएगा और वेतन देय होगा।
💸 युवाओं पर टूटा आर्थिक संकट
इस अनिवार्य प्रतीक्षा का खामियाजा सीधे युवाओं को भुगतना पड़ा—
- किसी ने दूसरी नौकरी छोड़ दी थी
- किसी ने EMI पर घर और वाहन लिया था
- बच्चों की फीस, माता-पिता का इलाज
- शादी और मेडिकल खर्च
6 महीने तक बिना वेतन रहने से कई परिवार कर्ज और मानसिक तनाव में चले गए।
⚖️ मामला पहुंचा हाईकोर्ट
विभागीय रवैये से परेशान होकर सहायक अभियंताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई के दौरान—
- सरकार ने “No Work, No Pay” का तर्क दिया
- जबकि अदालत के समक्ष यह स्पष्ट हुआ कि
- काम न लेने की गलती विभाग की थी
- कर्मचारी तैयार थे, लेकिन पोस्टिंग नहीं दी गई
पूर्व के कई मामलों में उच्च न्यायालय यह स्पष्ट कर चुका है कि अनिवार्य प्रतीक्षा काल का वेतन देना होगा।
🔥 अब सरकार पर 12% ब्याज का खतरा
याचिकाकर्ताओं ने केवल वेतन ही नहीं, बल्कि 12% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान की मांग की है।
यदि अदालत यही निर्देश देती है तो—
- सरकार पर लाखों–करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ
- राज्य के पहले से संकटग्रस्त वित्तीय हालात और बिगड़ेंगे
- और यह बोझ अंततः करदाताओं पर पड़ेगा
❗ सवाल सिर्फ वेतन का नहीं, व्यवस्था का है
यह मामला सिर्फ कुछ अभियंताओं के वेतन का नहीं है, बल्कि—
- विभागीय उदासीनता
- नियमों की अनदेखी
- और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़
का प्रतीक बन गया है।
झारखंड में पहले ही कई विभागों में—
- वेतन भुगतान में देरी
- नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी
- और कोर्ट केस
सामने आते रहे हैं। ऐसे में पथ निर्माण विभाग की यह लापरवाही सरकार की छवि को भी नुकसान पहुंचा रही है।
🧠 बड़ा सवाल
जब नियुक्ति पत्र दिया गया,
जब उम्मीदवार तैयार थे,
जब नियम स्पष्ट थे,
तो फिर—
👉 पोस्टिंग में देरी क्यों?
👉 वेतन क्यों रोका गया?
👉 इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
✍️ निष्कर्ष
सरकारी नौकरी को युवाओं के लिए सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब वही नौकरी अनिश्चितता और आर्थिक संकट का कारण बन जाए, तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे मामले बार-बार अदालतों तक पहुंचेंगे और झारखंड सरकार की फजीहत होती रहेगी।
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